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उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा शुरू होने से पहले दुकानदारों को अपनी दुकान के बाहर साफ-साफ अपना नाम लिखने को कहा गया है. खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रशासन कड़ाई से इसे लागू करवा रहा है. तमाम तस्वीरें आ रही हैं. दुकानदार पुराने नाम वाले बैनर-होर्डिंग हटाते दिख रहे हैं. उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के इस आदेश पर घमासान मच गया है. एक पक्ष इसको धार्मिक भेदभाव से जोड़कर देख रहा है तो दूसरा पक्ष नियमों का हवाला दे रहा है. तो आखिर क्या हैं नियम, कानून में क्या है? समझते हैं…

कैसे मिलता है दुकानों को लाइसेंस?
खाने-पीने की दुकानों या प्रतिष्ठानों (Food Shop Licence) के लिए लाइसेंस जरूरी है. यह दो अथॉरिटी जारी करती हैं. पहला केंद्रीय और दूसरा स्टेट. ऐसे प्रतिष्ठान जो केंद्र सरकार के दायरे में आते हैं, उन्हें केंद्रीय एजेंसी लाइसेंस देती है. जबकि जो राज्य सरकारों के दायरे में आते हैं, उन्हें संबंधित राज्य सरकार (State Government) लाइसेंस जारी करती है. उदाहरण के तौर आईआरसीटीसी (जो ट्रेनों में खानपान की व्यवस्था देखती है) जैसे प्रतिष्ठानों को केंद्र सरकार लाइसेंस देती है. जबकि किसी एक राज्य में संचालित प्रतिष्ठान को संबंधित सरकार से लाइसेंस मिलता है.

अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां प्रत्येक जिले में सहायक खाद्य सहायक आयुक्त खाद्य (द्वितीय) या अभिहित अधिकारी होते हैं, जो खाद्य प्रतिष्ठानों को लाइसेंस जारी करते हैं.

लाइसेंस में क्या-क्या लिखा होता है?
– दुकान या प्रतिष्ठान का नाम
– संचालक, प्रोपरटाइर या ऑनर का नाम
– फर्म का पूरा पता

क्या हैं लाइसेंस की शर्तें?
खाद्य प्रतिष्ठानों को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006 के तहत लाइसेंस जारी किए जाते हैं. लाइसेंस से जुड़े नियम-कायदों का प्रावधान फूड सेफ्टी रूल्स 2011 में किया गया है, जो डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार में बना था. इस रूल्स में लाइसेंस की शर्तों पर नजर डालें तो खाने-पीने की दुकानों के लिए कम से कम 15 कड़ी शर्ते हैं. सबसे पहली शर्त है खाद्य प्रतिष्ठानों को अपने लाइसेंस की असली कॉपी दुकान में किसी ऐसी जगह लगाना अनिवार्य है, जो उपभोक्ता को नजर आए.

लाइसेंसिंग की शर्तों में यह भी कहा गया है कि अगर दुकानदार अपने प्रतिष्ठान में किसी भी तरह का बदलाव करता है तो भी उसे लाइसेंसिंग अथॉरिटी को उसकी जानकारी देनी होगी. जैसे- उसने लाइसेंस जिस नाम पर लिया है, अगर दुकान का नाम बदलकर कुछ और कर देता है तो इसकी जानकारी देनी होगी. इसके अलावा जो सामान बेचने के लिए लाइसेंस लिया है, उससे इतर कोई और सामान नहीं बेचेगा. प्रतिदिन प्रोडक्शन, रॉ मैटेरियल और सेल्स का रिकॉर्ड रखना होगा.

देखें शर्तों की लिस्ट…

उत्तर प्रदेश सरकार के फूड सेफ्टी ऑफिसर एसएन सिंह https://hindi.news18.com/ से बातचीत में कहते हैं कि जब भी किसी व्यक्ति, संस्था अथवा फर्म को खाद्य पदार्थ के वितरण, भंडारण या मैन्युफैक्चरिंग का लाइसेंस दिया जाता है तो उसकी सारी डिटेल्स लाइसेंस पर मेंशन रहती है. जैसे प्रतिष्ठान का नाम, उसके संचालक अथवा ऑनर का नाम, पूरा पता इत्यादि. लाइसेंस की एक कंडीशन है. जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि लाइसेंस को अपने प्रतिष्ठान या दुकान पटल पर ऐसी जगह प्रदर्शित करना होगा, जहां ग्राहक उसे साफ़-साफ़ देख सकें. ऐसा नहीं है कि लाइसेंस को किसी फाइल में रख दिया.

गलत नाम रखा तो क्या?
फूड सेफ्टी एक्ट के तहत खाद्य प्रतिष्ठानों को जो लाइसेंस मिलता है, उसकी शर्तों के उल्लंघन पर कड़े जुर्माने का भी प्रावधान है. कोई दुकानदार अगर लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो लाइसेंस निरस्त किया जाता है. दुकान बंद कराई जा सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

कानून क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट आदर्श तिवारी hindi.news18.com से कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से दुकान चलाता है तो यह इमपर्सोनेशन के दायरे में आता है. अगर इसका उद्देश्य धोखाधड़ी है, तो आपराधिक मामला बनता है. वह कहते हैं खानपान ऐसी चीज है जो प्रत्येक व्यक्ति की सुचिता या मान्यता से जुड़ी है. मान लीजिये कोई व्यक्ति नॉनवेज नहीं खाता और नॉनवेज परोसने वाली दुकान पर जाना भी नहीं चाहता, पर दुकान का नाम ऐसा है जो उसे ऐसा विश्वास दिलाता है कि वहां नॉनवेज नहीं परोसा जाता होगा, तो यह धोखाधड़ी के दायरे में आएगा.

कानूनन कितनी सजा का प्रावधान?
पहले IPC के सेक्शन 416 में चीटिंग बाई पर्सोनेशन से जुड़ा प्रावधान था. जिसमें तीन साल तक की सजा थी. अब भारतीय न्याय संहिता (Bhartiya Nyaya Sanhita) की धारा 319 में इससे जुड़े प्रावधान हैं और सजा बढ़ाकर 5 साल कर दी गई है.

By admin

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