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डॉ. सचिन श्री

योगिनी एकादशी का व्रत आज है। आषाढ़ मास के कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं। मान्‍यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से आपके सभी पाप नष्‍ट होते हैं और आपको परम पुण्‍य की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी के व्रत में विधि विधान से विष्‍णु भगवान की पूजा की जाती है और व्रत कथा का पाठ किया जाता है। माना जाता है कि इस कथा का पाठ करने के बाद ही योगिनी एकादशी का व्रत पूर्ण माना जाता है। पढ़ें योगिनी एकादशी की कथा।

योगिनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने पूछा वासुदेव ! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है उसका नाम क्या है? कृपया उसका वर्णन कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले नृपश्रेष्ठ! आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम ‘योगिनी’ है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है। संसार सागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है। तीनों लोकों में यह सारभूत व्रत है। अलकापुरी में राजाधिराज कुबेर रहते हैं। वे सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहने वाले हैं। उनके हेममाली नाम वाला एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था।
हेममाली की पत्नी बड़ी सुंदरी थी। उसका नाम विशालाक्षी था। वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था। एक दिन की बात है, हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पली के प्रेम का रसास्वादन करने लगा, अतः कुबेर के भवन में न जा सका। इधर कुबेर मंदिर में बैठकर शिवजी का पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की। जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से पूछा- ‘यक्षो! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है, इस बात का पता तो लगाओ।’ यक्ष ने कहा- राजन् ! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो अपनी इच्छा के अनुसार घर में ही रमण कर रहा है।

यक्ष बोला– मैं महाराज कुबेर का अनुचर हूं। प्रतिदिन भगवान शिवजी की पूजा के लिए मानसरोवर से कमल पुष्प लाकर कुबेर के भवन में पहुंचाना मेरा कर्म था। लेकिन एक दिन पत्नी के साथ रमण करते हुए मुझे समय का ज्ञान न रहा और पुष्प ले जाने में विलंब हो गया। इससे कुबेर महाराज ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया और मैं कोढ से पीड़ित, पत्नी के वियोग से दुखी होकर दर-दर भटक रहा हूं। आज किसी पुण्य कर्म से मैं आज आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूं। ऋषियों का स्वभाव दयालु और परोपकार वाला होता है। सो हे महात्मन् आप ही मुझ अभागे को कर्तव्य का बोध कराते हुए पाप से मुक्ति का कोई उपाय बताएं।
मार्कण्डेयजी ने कहा—तुमने यह सच्ची बात कही है, असत्य भाषण नहीं किया है; इसलिये मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ। तुम आषाढ़ के कृष्णपक्ष की ‘योगिनी’ एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से तुम्हारी कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायगी। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—ऋषि के ऐसे वचन सुनकर हेममाली दण्ड की भांति मुनि के चरणों में पड़ गया। मुनि ने उसे उठाया, इससे उसको बड़ा हर्ष हुआ। मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने योगिनी एकादशी का व्रत किया, जिससे उसके शरीर की कोढ़ दूर हो गयी। मुनि के कथनानुसार उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह हेममाली पूर्ण सुखी हो गया।
नृपश्रेष्ठ! यह योगिनी का व्रत ऐसा ही बताया गया है। जो अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके समान ही फल उस मनुष्य को भी मिलता है, जो योगिनी एकादशी का व्रत करता है। ‘योगिनी’ महान पापों को शांत करने वाली और महान पुण्य फल देने वाली है। इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

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